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Sunday, June 24, 2018

इंदिरा गांधी का ये फैसला भारत की राजनीति में काला दिन माना जाता है


जून महीना तपती गर्मी के अलावा भारत के राजनीतिक इतिहास का भी एक यादगार दिन है। इस महीने की 25 तारीख को काले दिन के रूप में जाना जाता है, क्योंकि सन् 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश में निंरकुश आपातकाल की घोषणा की थी। 25 जून 1975 की शाम रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने विशाल जनसभा की थी, जनसभा की भारी भीड़ देखकर इंदिरा को अपनी सरकार लड़खड़ाती दिख रही थी।

देश के महामहिम राष्ट्रपति फ़ख़रूद्दीन अली खान ने देर रात…
देश के महामहिम राष्ट्रपति फ़ख़रूद्दीन अली खान ने देर रात आपातकाल के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए।  जिसके बाद 26 जून की सुबह इंदिरा ने सभी केबिनेट मंत्रियों की बैठक की और आपातकाल के बारे में बताया। बैठक में मौजूउ गृहसचिव खुराना ने सभी को घोषणा पत्र सुनाया उसके बाद गृह राज्यमंत्री ओम मेहता ने सभी मंत्रियों को आंतरिक आपातकाल के संदर्भ में समझाया गया। मंत्रिमंडल के लगभग सभी मंत्रियों ने इंदिरा के इस फैसले का समर्थन किया लेकिन स्वर्ण सिंह ने इसका विरोध किया तो इंदिरा ने औकात दिखाकर चुप करा दिया। जिसके बाद इंदिरा ने आपातकाल की घोषणा करते हुए आकाशवाणी पर कहा कि – भाईयों और बहनों राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आंतकित होने की कोई आवश्यकता नहीं हैं।
आपाताकाल के दौरान इंदिरा सरकार ने सभी मीडिया व समाचार पत्रो के…
आपातकाल का विरोध करने वाले अनेक राजनेताओं को हिरासत मे बंद कर दिया गया था। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, लालू प्रसाद यादव, चरण सिंह, नीतीश कुमार, मधु दंडवते आदि तमाम नेताओं ने विरोध किया। इंदिरा सरकार ने आरएसएस के तत्कालिन सरसंघचालक बालासाहब देवरस, वेकैंया नायडू, अरूण जेटली, रामविलास पासवान, प्रकाश जावड़ेकर, और पीएम मोदी को भी न्यायिक हिरासत मे भेजा। आपाताकाल के दौरान इंदिरा सरकार ने सभी मीडिया व समाचार पत्रो के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी ने पुरूषो की जबरन नसबंदी कराई। इस दौरान संविधान की धारा 21 तक निलंबित कर दी, जिसमे हर नागरिक को जीवन जीने का अधिकार था। बड़ी हैरानी की बात है कि जिनके पिता जवाहर लाल नेहरू ने संविधान का दीपक जलाकर देश को रोशन किया था। उन्ही की बेटी ने उस दीपक को अपनी तानाशाही के चलते बुझा दिया।
19 महीने चली इंदिरा की तानाशाही के बाद…
देश के लोकतंत्र को मानो कठपुतली की तरह नचाया जा रहा हो। आपातकाल के खलनायक संजय गाँधी ने अपनी माँ की सत्ता का दुरूप्रयोग कर देश के कानून पर घातक हमला किया। उस दौरान तो मानो देश की जनता को सांस लेने के लिए भी इंदिरा की अनुमति चाहिए थी । खत्म होती मानवता और न्यायिकता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हज़ारो राजनीतिज्ञों को मीसा एक्ट के तहत हिरासत में भेज दिया गया। लोकतंत्र इंदिरा और संजय गाँधी का बंधक बन गया था। 19 महीने चली इंदिरा की तानाशाही के बाद 18 जनवरी 1977 को इंदिरा ने आपातकाल को खत्म करने का निर्णय लिया और सभी राजनेताओ को जेल से रिहा कर देश में चुनाव कराया।

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