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Monday, November 19, 2018

इंदिरा या लक्ष्मीबाई किसका जन्मदिन मनाओगे आज : एक बड़ा सवाल

भारत देश की एक महिला ने भारत को आज़ादी दिलाने के लिए अपने प्राणांे का बलिदान कर दिया और दूसरी ने आज़ाद होने के बाद भारत के लोकतंत्र पर घातक हमला कर दिया। आज 19 नवबंर को ही इन दोनो महिलाओं का जन्मदिन है। परन्तु यह एक बड़ी चुनौतिपूर्ण परिस्थिति हैे हम भारतीयों के लिए की हम अपने दिलो में किसको अधिक महत्व देते है।

लोकतंत्र को कठपुतली की तरह नचाने वाली का जन्मदिन............
भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
आजा़द भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री और देश में संविधान का दीपक जलाने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी की आज 101 वीं जंयती है। इंदिरा की छवी भारतीयों के दिलों मंे एक भयावह राजनेता के रूप में बनी हुई है, जिसने  अपने शासनकाल में भारतीय राजनीति का स्वरूप ही बदल दिया था। उस दौरान भारतीयों को ऐसा आभास हो रहा था कि, इंदिरा सरकार के कार्याें के रूप में काले अंग्रेज भारतीयांें पर अपना दवाब बनाने का अथक प्रयास कर रहें थे। आम जनता हैरान थी कि जिसके पिता ने संविधान का दीपक जलाया था, उन्ही की सुपुत्री अपनी तानाशाही के चलते उस दीपक की रोशनी का बुझा रही है। 25 जून, सन् 1975 का वो दिन तपती गर्मी के अतिरिक्त भारत की राजनीति का काला दिन था, जब इंदिरा गांधी ने भारत में निंरकुश आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। आपातकाल का विरोध करने वाले हज़ारो राजनेताओं को गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया। लोकतंत्र का अपमान कर तानाशाही करने वाली महिला को शायद ही ये देश कभी भूल पाएगा। लोकतंत्र के चैथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया को भी अपने अधीन कर इंदिरा ने अपने समय की सबसे बड़ी गलती की, जो मीडिया समाज के दर्पण के रूप में कार्य करता है आपने उसी को गुलाम बनाया।

  बेटे के कारण ये हाल हो गया इंदिरा गांधी का...........
आपातकाल के खलनायक संजय गांधी
 
देश के लोकतंत्र को मानों कठपुतली की तरह नचाया जा रहा हो। इसके पीछे भी कूटनीति का बहुत बड़ा हाथ था। इंदिरा के बेटे और उस समय आपातकाल के खलनायक संजय गांधी ने अपनी मां की सत्ता का दुरूप्रयोग कर देश के कानून को अपना गुलाम बनाकर देश की जनता पर कई जुल्म ढोहे। पुरूषों की नसबंदी कराना, लोगो के संवैधानिक अधिकारों का हनन करना इन सबके पीछे संजय का ही हाथ था। उस दौरान तो मानों देश की जनता को सांस लेने के लिए भी इंदिरा की अनुमति चाहिए थी। खत्म होती मानवता और न्यायिकता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हज़ारों राजनीतिज्ञों को मीसा एक्ट के तहत हिरासत में भेज दिया गया। लोकतंत्र इंदिरा और संजय गांधी का बंधक बन गया था। खैर देर आए दुरुस्त आए 19 महीने चली इंदिरा की तानाशाही के बाद 18 जनवरी 1977 को इंदिरा ने आपातकाल को खत्म करने का निर्णय लिया और सभी राजनेताओं को जेल से रिहा कर देश में चुनाव कराया। चुनाव परिणाम से साफ पता चल गया कि लोगो के दिलो में जो इंदिरा की जो भयावह छवी उत्पन्न हुई  थी, उसका ही नतीजा था कि देश में पहली बार कोई गैर - कांग्रेसी प्रधानमंत्री बना था। जनता पार्टी के मोरारजी देसाई के आगे इंदिरा को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

अंग्रेजों को लोहा देने का जन्मदिन..............
अंग्रेजी हुकुमत को हिला देने वाली रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले में 19 नवम्बर 1828 को एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसके बचपन का नाम मणिकर्णिका था पर परिवार वाले उन्हें स्नेह से मनु पुकारते थे। उनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे था और माता का नाम भागीरथी सप्रे। उनके माता-पिता महाराष्ट्र से सम्बन्ध रखते थे।

अंग्रेजी हुकूमत को लोहा देने वाली रानी लक्ष्मीबाई
ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत अंग्रेजों ने बालकदामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स’ नीति के तहत झाँसी राज्य का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में करने का फैसला कर लिया। हालाँकि रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया पर अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध कोई फैसला हो ही नहीं सकता था इसलिए बहुत बहस के बाद इसे खारिज कर दिया गया। अंग्रेजों ने झाँसी राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगादाहर राव के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काटने का हुक्म दे दिया। अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को झाँसी का किला छोड़ने को कहा जिसके बाद उन्हें रानीमहल में जाना पड़ा। 7 मार्च 1854 को झांसी पर अंग्रेजों का अधिकार कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में झाँसी की रक्षा करने का निश्चय किया।

अंग्रेजी सलत्नत से संघर्ष जारी रहा................ 

अंग्रेजी हुकुमत से संघर्ष के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भी भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। झाँसी की आम जनता ने भी इस संग्राम में रानी का साथ दिया। लक्ष्मीबाई की हमशक्ल झलकारी बाई को सेना में प्रमुख स्थान दिया गया।
तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया पर 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गयीं।

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